प्रतिनिधि हो गई हूं अपने वंश की

प्रतिनिधि हो गई हूं अपने वंश की

कहीं गए नहीं बाबा मेरे
शामिल हो गए मेरे अस्तित्व में
रूढ़ियों की ख़िलाफत बन कर
खोया नहीं था मैंने मां को
वह मुझमें ही समा गईं थीं
स्नेह बन कर
खोया नहीं था मैंने बहन को
वह मेरे साथ ही रहने लगी
मेरा बचपना बन कर
खोया नहीं मैंने सासू मां को
वह मुझमें झलकने लगीं
उपदेश और कहावतों की शक्ल में
खोया नहीं मेरा प्यारा देवर भी
वह एकात्म हो गया मेरे साथ
दबंगी की सूरत में
खोए नहीं मेरे पिताजी
वो मेरे साथ रहने लगे
अतिथि सत्कार का रूप धारण कर
कहीं गए नहीं हैं पापा भी
वो समाहित हो गए हैं मुझमें
अनुशासन बन कर
मैं, सिर्फ़ मैं ही नहीं रही
प्रतिनिधि हो गई हूं
अपने वंश की।
रेनू सिंह चन्द्रा

Share Button

खेत और पेट के लिए पानी नही वहां स्वीमिंगपूल क्यों?

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी का पानी की ज्वलन्त समस्या पर विचारणीय आलेख
**अलीम**
गर्मी शुरू होते ही कुदरत का कहर शुरू हो गया। पारा 50℃ छूने को आमादा है । तो पानी के उपकरण साथ छोड़ने को बेकरार है। हम लोग कुदरत के इस सितम से बचने के लिए प्रयास तो करते रहे लेकिन उन प्रयासो में द्रढ़ता कम औपचारिकता ज़्यादा रही यही कारण है कि आज हम जिस विषम परिस्थिति में खड़े है इस स्थिति के लिए कोई और नही हमारी उदासीनता दोषी है।
घर का पानी भर जाने के बाद घर के बाहर घण्टो बेमतलब की सिंचाई करके पानी की बर्बादी करते है जबकि शोधकर्ता चिल्ला चिल्ला कर कहते है कि समय रहते नही जागे और पानी को संचित नही किया तो आने वाले समय में इतनी भयवाह स्थिति होगी जिसकी कल्पना नही की जा सकती है।
सरकारों-शोधकर्ताओ की आवाज़ को इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देते है।बुन्देखण्ड जैसे क्षेत्र में जहां वक़्त आने पर नल, कुएं ,हैंडपम्प, पोखर, तालाब साथ छोड़ जाते है। जहां खेत और पेट के लिए पानी कि किल्लत है। छोटे और मझोले किसानों की हज़ारो एकड़ खेती की भूमि पानी की तंगी के चलते किसान को तबाह, बर्बाद और कर्ज़दार बना देती है।
वहां स्वीमिंगपूल बनाकर मनोरंजन करना कहा का इंसाफ है। ऐसा करने के लिए किसने आज्ञा दी और संचालको ने किस नियम के अनुसार ये कार्य शुरू किया । यदि ऐसा करने की आज्ञा नही दी तो ज़िम्मेदार अधिकारी चुप क्यों है। संचालको पर कार्यवाही और स्वीमिंगपूलो पर ताले कब लगेंगे ।
विभाग की अनदेखी के चलते पिछले कुछ वर्षों से स्वीमिंगपूल का चलन आम हो गया है। जिसके पास जगह है उसने ज़मीन में छेद किया और बोर करवाकर सीधा स्वीमिंगपूल में भर दिया। प्रत्येक व्यक्ति 70 से 80 रुपये घण्टे के हिसाब नहाने की फीस रखी। इस पानी की बर्बादी रूपी मनोरंजन के पीछे कितने कष्ट है ये उन लोगों से पूंछो जो मीलो दूर से सर, साइकिल,बैलगाड़ी,जैसे तमाम साधनों से पानी लाकर मात्र प्यास बुझा रहे है। ठंडक के नाम पर चबूतरे की सिंचाई की बात तो दूर की कौड़ी है।
इतना ही नही शहर में गैरिज खोल दिये गये जिसमे ट्रक,बस,कार,मोटरसाईकिल की सफाई के नाम पर कितना पानी बहा दिया जाता है इसका न कोई हिसाब है और न कोई ब्यौरा। बीते सालों में तत्कालीन जिलाधिकारी ने गैरिज में पानी के प्रयोग (गाड़ी धोने) पर प्रतिबंध लगा दिया था जो प्रतिबन्ध आज भी जारी है लेकिन गैराज सुचारू रूप से संचालित है।
विभाग कुम्भकर्णीय नींद में लीन है।
ऐसा नही है कि पानी को लेकर सरकार चिंतामुक्त हो पूर्व और वर्तमान केंद्र और राज्यसरकारों ने इस स्थिति से निपटने के लिए प्रयास किये है और कर रहीं है। सरकारों ने खुद के माध्यम से और एन.जी. ओ. के माध्यम से प्रचार,प्रसार,में पैसा खर्च करने में कोई कमी नही रखी पानी की बचत,पेड़-पौधे , नदी, जल- स्तर,को गावँ में पानी के संचित करने के लिए तालाब जैसे अभियान में करोङो रुपये खर्च किया। गैर सरकारी समाजिक समूहों ने पैसा लिया बन्द कमरे में गोष्ठी की और विज्ञप्ति समाचार पत्रों में प्रकाशित करवा दी जिसका नतीजा वही “ढाक के तीन पात’ पेड़,पानी,वन सब लगातार घट रहे है। तो पैसा कहा, कैसे और किस पर खर्च कर दिया गया? जागरूकता के नाम पर लूट करने वालों पर कार्यवाही होंनी चाहिए।
सरकार सजग तो है लेकिन जिलास्तर के अधिकारियों की उदासीनता के चलते सरकार के मंसूबे बिखर जाते है। भूगर्भ में पानी की बचत कैसे हो जब सम्बंधित विभाग के ज़िम्मेदार अधिकारी जो गर्मी के गर्मी जागते हो।
अगर ऐसा ही चलता रहा जैसा चल रहा है तो वो दिन दूर नही जब ज़मीन पानी देने में असमर्थता जता देगीं।
इससे पहले की हमलोग बूंद बूंद को तरसे खुद को जगाना होगा और सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर निःशुल्क, निःस्वार्थ जनता को जागरूक करना पड़ेगा। नही तो आने वाली पीढ़ी के लिए नदी,कुएं,तलाब,पोखर सिर्फ कहानी बन जाएंगे। क्यों कि प्रकृति का सिद्धांत है वो आपदा का इशारा करती है। अचानक आपदा नही भेजती।

Share Button

जिलापंचायत अध्यक्षा अब बीजेपी में….

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी का आलेख
2016 में फरहनाज के जिला पंचायत अध्यक्षा की शपथ लेने के मात्र 23 दिन के बाद अध्यक्षा का अचानक उनका निधन हो गया उनके निधन के कुछ दिन गुजरे ही थे कि स्वर्गीय अध्यक्षा के परिवार सहित सारे राजनैतिक दल हरकत में आ गए। चुनाव की तिथि का ऐलान हुआ और तत्कालीन मुख्यमंत्री अखलेश यादव ने पुनः स्वर्गीय अध्यक्षा के परिवार के सदस्य को सपा का उम्मीदवार बनाया। और जिले स्तर पर मची पार्टी में उथल पुथल को देखते हुए लखनऊ बुलाकर आगाह किया था कि उक्त सदस्य को समर्थन और साथ दें। उस समय पार्टी में अंतरकलह घर कर चुका था जिसका परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री की बात को तबज्जो नही दी गई।
लेकिन जब तक चुनाव की तिथि आती तब तक गंगा में पानी बह चुका था जिसमें भावनाऐं, सम्वेदनाएँ, दुःख, दर्द, पार्टी सुप्रीमो का आदेश सब बह कर निकल चुका था। चुनाव जोड़ तोड़ पैसा कौड़ी की राजनीति पर निर्भर हो गया था। मोलभाव और पार्टी के जिला हाईकमानों से सम्पर्क प्रत्याशियों की दिनचर्या में आ गया था उस समय बसपा और भाजपा के बे-मेल जनपद स्तरीय गठबंधन ने उन्हें समर्थन दिया। जिसमे सपा के कुछ सदस्यों ने उस गठबंधन को जोड़े रखने के लिए एक कड़ी का काम किया। जिसका नतीजा सामने आया और गैर सपाई बसपाई अध्यक्ष बन गया लेकिन दोनो पार्टी इस गुमान में थी कि मेरा अध्यक्ष बन गया । इस अस्थायी गठबन्धन के पीछे के कारण कष्टदाई थे। क्यों कि उनको अध्यक्षा बनाने में कुछ पार्टियों के सदस्यों ने अपने उसूल और पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता को ताख पर रखकर उनको अध्यक्ष बनाने में मदद की इस चुनाव को सम्प्रदायिक रंग देने में भी कसर नही छोड़ी गई । जब सम्प्रदायिकता की हंडिया पक गई तब वर्तमान सांसद ने इस राजनैतिक कुरुक्षेत्र में अपनी आमद दर्ज कराई उनकी चाणक्य राजनीति के चलते ऐसा होना सम्भव हुआ। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से बनाये गये अधिकृत अध्यक्ष प्रत्याशी की तरफ देखे बिना निर्दलीय प्रत्याशी पर अपनी ताकत झोंक दी हालांकि भाजपा पार्टी के प्रत्याशी को पार्टी के इस बेरुखेपन से हार्दिक घात पहुंचा लेकिन वो हताश ओर निराश स्थिति में मूकदर्शक बनकर राजनैतिक चाले देखते रह गए। यही हाल अल्पसंख्यको का भी था सपा और बसपा के नेताओ के द्वारा रचित इस नाटकीय मंच को देखकर वो भी अचंभित थे। मुस्लिम सिम्पेथिक पार्टीयों की इस हरकत को देखते हुए अल्पसंख्यको में एक नारा मशहूर हुआ ‘‘हमे तुम मंजूर नही‘ तो ‘तुम हमे मंजूर नही‘‘ इस कथन का असर इतना हुआ कि 2017 के विधान सभा चुनाव में अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्र से बीजीपी को खासा वोट मिला। हालांकि इस चुनाव में भीष्मपिता की भूमिका निभा रहे एक सत्तारुढ़ पार्टी के पूर्व साँसद का राजनैतिक बध्य हो गया। जिसके चलते आज महलनुमा सफेद बंगले पर कोई राजनैतिक व्यक्ति घुसना पसन्द नही कर रहा है।
अब जब जालौन जिलापंचायत अध्यक्षा सुमन निरंजन अपने प्रतिनिधि पति के साथ भारतीय जनता पार्टी में समाहित हो गई है।तो ये चौकाने वाली बात इसलिए नही है कि कहावत है कि पूत के पैर पालने में नजर आते है। पिछले तीन सालों से लगातार भारतीय जनता पार्टी के प्रत्येक प्रोग्रामो में अध्यक्षा प्रतिनिधि की उपस्थिति प्रार्थनीय रही।बीजेपी के किसी बड़े नेता के जनपद में आगमन से लेकर प्रस्थान तक की मौजूदगी बताती थी के बीजेपी की तरफ उनका रुझान दिन व दिन बढ़ रहा था। पार्टी में बड़े दरवाजे से घुसने की इच्छा रखने के कारण तस्वीर साफ नही हो पा रही थी बीते दिनों उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री के समक्ष बीजेपी में अपनी आस्था व्यक्त की और प्रवेश कर गए।
असल मे जिलापंचायत जितने का उसे श्रेय अध्यक्षा प्रतिनिधि को जाता है उनका राजनीति से कोई वास्ता नही रहा मूलरूप व्यापारी और सक्षम किसान थे। अध्यक्षा प्रतिनिधि पति की
मुधुरभाषा, हँसमुख स्वभाव निर्विवाद ने उनके व्यक्तित्व को निखारा है यही कारण था कि पूर्व जिलापंचायत अध्यक्ष के सिपेसहलरों में उनकी गिनती होती थी। उन्ही से प्रेरित होकर वो राजनीति में आये शुरुआत में सपा के नेता और कार्यकर्ता उनको अपने खेमे के अध्यक्ष मानते थे हालांकि पूर्वाध्यक्ष चाहते थे कि अध्यक्षा सपा में रहकर अध्यक्षी चलाये लेकिन कुछ लोगो को छोड़ दिया जाए तो बाकी सब ने आर्थिक मदद के चलते उन्हें पदासीन किया इसलिए उनके फैसले पर उन बहुसंख्यक सदस्यों को बोलने और टोकने का अधिकार नही जिन्होंने अध्यक्षा से आर्थिक मदद ली है फिर वो चाहे कांग्रेस,सपा,बसपा हो या जिलापंचायत के निर्दलीय सदस्य ही क्यों न हों।
हालांकि विभिन्न दलों के राजनैतिक पँडित इनके बीजेपी में जाने से अपनी अपनी पार्टी में कोई खास असर नही बता रहे है। उनका कहना है कि मन से तो थे अब तन,मन,धन से चले गए।उनके जाने से किसी पार्टी को वोटों का कोई नुकसान नहीं होने वाला है।

Share Button

मूर्छित पड़ी काँग्रेस को खड़ी के साथ बड़ी करने के इरादे

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी की बेवाक कलम
‘‘अलीम’’
प्रियंका के राष्ट्रीय महासचिव बनते ही तरह तरह की आवाजें राजनैतिक गलियारों में गूंज रही है धुरविरोधियों का कहना है कि 28 सालों से उत्तरप्रदेश में सत्ता से बंचित काँग्रेस ने प्रियंका बाड्रा गांधी नाम का आखरी तीर तरकश से निकाल कर छोड़ दिया तीर अभी हवा में ही है । इससे कुछ खास होने वाला नही है। लेकिन काँग्रेसी कहते हैं कि प्रियंका के आने की आहट मात्र से राजनैतिक गलियारे में हलचल और विरोधियों के माथे पर चिंता की लकीर बता रही है कि कुछ अच्छा होने वाला है। आगे क्या होगा ये समय के गर्भ में है लेकिन काँग्रेस की इस चाल से सत्तासीन भाजापा के माथे पर चिंता की लकीरे दिख रही हैं तो गठबन्धन की नींद भी हराम हो गई है।
प्रियंका के आने से कांग्रेस का ग्राफ चढ़ने लगा है । ये ग्राफ कितना सार्थक रहेगा जबकि उत्तर प्रदेश में काँग्रेस 28 साल से बीमार पड़ी है। उसकी हालत उस व्यक्ति जैसी है जो देखने मे स्वस्थ्य मालूम पड़ता है लेकिन शरीर में कई बीमारी लेकर घूमता है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश में प्रियंका ने तीन दिन का प्रवास किया उस दौरान उन्होंने जिलास्तर के कार्यकर्ताओं से रूबरू होकर पार्टी के हालत को तलाशने की कोशिश की।
जिसमे प्रियंका प्रदेश की जमीनी हकीकत सुनकर दांतो तले उंगलियां दवा बैठीं।
उनको जानकर आश्चर्य हुआ कि जिलाध्यक्ष/शहर अध्यक्ष से लेकर दूसरी पार्टी के हताश नेताओं को विधायक और सांसद तक के टिकट दिलवाने की साई और पार्टी द्वारा प्रत्याशी को दी जाने वाली चुनावी राशि में बन्दर वाट करने वाले नेताओं की लंबी कतार है। कांग्रेस में रहकर दूसरी पार्टी से समझौता करके अपनी राजनीति चलाने वालों की भरमार है। जिले से लेकर प्रदेश तक के नेताओ ने कार्यकर्ताओं को जोड़ने की प्रथा समाप्त कर दी। पार्टी से लगातार पलायन होता रहा लेकिन उसको समझने की कोशिश की गई न रोकने का प्रयास।
ये खेल स्थानीय नेताओं के दिल्ली में बैठे तीसरी और चौथी लाइन के नेताओ (आकाओं) के इशारे पर चलता रहा है।
जिले में बैठे नेताओं को पद विहीन होने की चिंता नही क्यों कि जिले से हटे तो प्रदेश स्तरीय में पद से नवाजे जाते रहे। प्रमुख सचिव से लेकर जिलाअधिकारी तक के अपने काम करवाते रहे। और कार्यकर्ताओं पर मुसीबत पड़ने पर थाने तक जाने में परहेज करते रहे।
पार्टी के अंदर इस सारे भितर घाती काफिले की हकीकत सुनकर प्रियंका के मुस्कुराते चेहरे ने गम्भीरता ओढ़ली लेकिन अब परेशानी ये है कि सजा शुरू किनसे की जाए? सजा नही देते तो पार्टी की स्थिति यथास्थिति रहेगी और सजा देते है तो पार्टी में बिखराव सुनिश्चित है। इसलिए हो सकता है कि थाली में छेद करने वाले काँग्रेसियों को पार्टी से निकाला जाएगा । युवाओं को चांस दिया जाए और बुजुर्ग काँग्रेसियों को आराम के साथ सम्मान् दिया जाएगा। पार्टी को खड़ा करना और बड़ा करना है तो कुछ नया और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। प्रियंका ने अपना रुख दंडात्मक किया है जिसकी भनक पुराने नेताओ को लग गई है। प्रियंका के इस तेवर से पार्टी के बुजुर्ग नेताओ में खलबली तो है। वो जानते है कि वर्तमान समय में काँग्रेस ने निकाल दिया तो वार्ड मेम्बर बनने की स्थिति में नहीं हैं।

Share Button

काँग्रेस इतनी मजबूर कैसे हो गई ?

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी
‘‘‘‘अलीम’’’’
कांग्रेस का सत्ता का सफर आजादी के बाद से दशकों तक चलता रहा। कुछ प्रदेश छोड़ दें तो पूरब से पश्चिम उत्तर से दक्षिण तक कांग्रेस का सिक्का चलता था। प्रधानमंत्री के कार्यालय से लेकर सेवादल की शाखा कार्यालय तक की अपनी शान हुआ करती थी।
80 के दशक तक सब (विपक्षी पार्टियां) मिल कर कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की जुगत में रहती थी। आज कांग्रेस सब के साथ मिलकर भाजपा को सत्ता से हटाने की जुगत में व्यस्त है। इतिहास के पन्ने पलट कर देखा जाए तो विपक्ष में होने के बावजूद सत्ता के गलियारों में उसकी धाक, बरकरार रहती थी। यही कारण था कि कांग्रेस ने मोरारजी देसाई से लेकर अटल बिहारी बाजपेयी तक किसी को सुकून से सत्ता नही चलाने दी।
इसी सत्ता की मद में चूर कांग्रेसी नेताओ की उदासीनता, निष्क्रियता, और गुटबाजी के कारण 90 के दशक के मध्य में कांग्रेस को ग्रहण लगना शुरू हो गया जिसने हिंदी भाषी क्षेत्रो में काला अंधेरा ला दिया। थोड़ी रोशनी बनी रहे इसके लिए 97 में सोनिया गांधी ने कमान संभाली और एड़ीचोटी का जोर लगाकर 2004 में सत्ता सीन हो गई और फिर दस साल तक पीछे मुड़कर नही देखा । अनुभव कम और शोहरत ज्यादा में सोनिया गांधी ने हिंदी भाषी क्षेत्रों की तरफ से आंख मीच ली । इस बेरुखी से उत्तर प्रदेश में बचा कुचा वोट बैंक भी जाता रहा। आज जब दिल्ली के सिंघासन पर बेटे को आसीन करने की बारी आई तो हाथ के साथ झोली भी खाली है। अब कल्पना मूर्त रूप कैसे लेगी ये समझना पड़ेगा।
उत्तरप्रदेश में 2017 के विधान सभा चुनाव में सपा से मिलकर जो भाग्य आजमाईश की हालत उससे साफ हो गए थे कि अब कुछ बचा नहीं है। यही कारण है कि कर्नाटक के मंच पर गठबंधन का नाटक प्रस्तुत किया गया।
इस नाटक में विभन्न तरह के किरदार एक जुट तो हुए लेकिन सबकी अपनी ढपली सब का अपना राग था। सब अपने अपने किरदार में महारथी थे। ममता बनर्जी को राहुल के भावी प्रधानमंत्री वाले बयान से एलर्जी हो गई तो अखिलेश ने भी मध्यप्रदेश में एहसान फरामोश बताकर कांग्रेस को सकते में डाल दिया। मायावती ने कांग्रेस और भाजपा को ….मौसेरे भाई बताकर गठबन्धन से बाहर कर दिया। इन नेताओं के बयानों की निंदा अभी तक भावी गठबंधन के किसी दल ने नहीं की है।
मध्यप्रदेश सहित 5 राज्यों के चुनाव में सपा बसपा के अकेले चुनाव लड़ने से कांग्रेस के सामने मुश्किलें पैदा तो कर दी साथ ही गठबंधन पर प्रश्न चिन्ह भी लगा दिया था।
कांग्रेस के सामने मुश्किल ये है कि दिल्ली की राजगद्दी पाना चाहती है पर ये रास्ता यू पी से होकर जाता है लेकिन ये रास्ता उसके लिए ऊबड़खाबड़ है। ये रास्ता बसपा और सपा की बैसाखी के बिना पार करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
अभी तक जो बातें सामने आई है वो सपा बसपा की एकता का एलान हो गया लेकिन कांग्रेस के लिए अच्छे संकेत नहीं मिल रहे हैं। गठबंधन के लिए कांग्रेस पुनः प्रयास रत तो है लेकिन दोनों पार्टी ने सीधा बोल दिया है जितनी जिसकी हिस्सेदारी उतनी उसकी भागीदारी इस नारे में कांग्रेस किसी भी कोने में फिट नहीं बैठती। अब सोचने की बात ये है कि काँग्रेस इतनी मजबूर कैसे हो गई?
इसके लिए पार्टी के अंदुरूनी दीमक रूपी किरदार, गुटबाजी, चाटुकार्तापन, और खोखली राजनीति जिम्मेदार है। क्यों कि लगातार सत्ता मिलने से सत्ता की मद में चूर पार्टी के कद्दावर नेताओं को फुर्सत ही नहीं मिली कि जमीनी कार्यकर्ताओ से सीधा संवाद कर सके। पिछले 2 दशकों में वही हाल हुआ जो बंजारे के काफिले में एक जानवर का होता है। असल मे बंजारे जब अपने काफिले के साथ दूसरी जगह पलायन करते है तो उनके काफिले के आगे एक जानवर चलता है वो बार बार पीछे मुड़कर काफिले को देखता है। और अपने दिल और दिमाग मे बैठा लेता है कि इस काफिले का बोझ मेरे ऊपर है। यही हाल पार्टी के नेताओ का रहा जो ये समझते रहे मेरे बिना पार्टी कुछ नहीं कर सकती और अपनी मन मर्जी करते रहे और जनता से अपना विश्वास लगातार खोते चले गए। आज सबसे पुरानी पार्टी के पास प्रदेश में कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं, बचा जिसके सक्रिय होने से वोट का प्रतिशत भी बढ़ सके जीत तो दूर की कौड़ी है।
अब कांग्रेस के आगे समस्या ये है कि कांग्रेस में सिवा राहुल के दूसरा कोई नेता नहीं है जिस पर विश्वास किया जाए। लेकिन जनेऊ और गोत्र, जाति में फंसे राहुल अब अल्पसंख्यक और दलित को कैसे समझाएंगे के ये नाटक था या समय की माँग क्यों कि सत्ता में आने के लिए गोत्र की नहीं वोट की जरूरत होती है। दोनों वोट बैंक वर्षो कांग्रेस की मूलवोट हुआ करते थे। यदि ये वोटर इसबार भी कांग्रेस के साथ खड़े नहीं होते हैं तो दो सीटों पर भी मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है।

Share Button

कम्बल खामोशी से भी दिया जा सकता था…….

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी का ज्वलन्त सवाल
 ‘‘अलीम’’
असल मे दान का कोई समय निश्चित नही है। सर्दी, गर्मी, बरसात हर समय निर्धन, लाचार, लावारिस, की मदद करनी चाहिए ये पुण्य का काम है जो दुनिया का हर धर्म कहता है। सर्दी चल रही है निर्धन और लाचार लोगों की मदद के लिए दानदाता रात को सूनी सड़कों पर कम्बल लेकर निकलते हैं। गरीब मिला उसके कंधे पर कम्बल डाला और फोटो खिंचवाई। दूसरे दिन कोशिश करके अखबार में मय फोटो के न्यूज लगवा दी। व्हाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया के द्वारा अपने द्वारा कृत कार्य को आम लोगों तक पहुंचाते हैं।
ये देखने के बाद एक पौराणिक कथा याद आ गई। दान देने में अर्जुन भी बहुत आगे थे लेकिन उनके आगे कभी दानवीर नहीं लगा एक बार अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा कि कर्ण को दानवीर कर्ण क्यों कहा जाता है ? मुझे अच्छा नहीं लगता। अर्जुन को जवाब देने के लिए श्री कृष्ण ने दो सोने के पर्वत मंगवाए और अर्जुन से बोले कि इनको निर्धनों में बांट दो अर्जुन ने गांव वालों को पर्वतों के पास आने के लिए कहा और सोना बांटना शुरू कर दिया बांटते बांटते अर्जुन थक गए अर्जुन ने कहा कि आब मुझे आराम करना है मैं थक गया हूं तब श्री कृष्ण कहा कि तुम आराम करो और देखो । श्री कृष्णा ने कर्ण को बुलाया और कर्ण से कहा यह दोनों सोने के पर्वतों को निर्धनों में बांट दो आदेश होते ही कर्ण ने गांव वालों से कहा यह दो सोने के पर्वत तुम लोगों के हैं जैसी जरूरत हो वैसे आपस में बंट लो। तब श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा जब तुम बांट रहे थे तुम्हारे अंदर अहम था तुम दिखावा कर रहे थे जिससे निर्धन लज्जित हो रहे थे। दूसरी तरफ कर्ण से जब बाँटने के लिए कहा गया तो उसने कहा कि ये तुम्हारा है तुम ले जाओ उस समय कर्ण के अंदर न अहम था न किसी गरीब को लज्जित करने का इरादा था । इसलिए उसे दानवीर कर्ण कहा गया है। इसलिए दिखावा नही कर्तव्यों का निर्वहन निष्पक्ष और स्वक्ष हृदय से करना चाहिए।
दान करके दिखावा करने की प्रवृत्ति को धार्मिक और सामाजिक तो नहीं कह सकते लेकिन स्वंय की दिखावा प्रवृत्ति साफ झलकती है ।
पिछले दिनों रेलवे स्टेशन पर ऐसा ही नजारा देखने को मिला । कुछ दानकर्ता निर्धनों को तलाशते आये। समय अधिक हो गया था ठंड भी ज्यादा थी इसलिए भीड़ कम थी बहुत कोशिश के बाद एक महिला मिली उसके कंधे पर कम्बल रखा फिर शुरू हो गया फोटो शेषन उसी समय एक ट्रेन का आगमन हुआ यात्री बाहर निकल रहे थे और सब की निगाह उन दान दाताओं पर जा रही थी जो गरीब को एक कम्बल देकर उसके साथ फोटो खिंचवा रहे थे। कम्बल खामोशी से भी दिया जा सकता था इसमें उस गरीब का स्वाभिमान बच जाता और आप का पुण्य कार्य भी हो जाता।
आखिर हम लोग कब तक गरीबों की गरीबी का मजाक बनाते रहेंगे। समय का फेर है वर्ना कोई नही चाहता के आस्थाई रैन बसेरे में रात गुजारे, कम्बल लेने की लाईन में लगे और कम्बल लेते सुबह अपनी फोटो अखबार में देखे। ये अधिकार हमलोगों को किसने दिया कि किसी की लाचारी को भरे बाजार नीलाम करें।
दान करिये लेकिन दान करने वाले और दान लेने वालों के बीच अन्य लोगों का पर्दा भी जरूरी है। गुप्तदान और सिर्फ गुप्तदान से पुण्य मिलता दिखावे से नही। क्यों कि दान तो अर्जुन भी करते थे और कर्ण भी, अर्जुन कृष्ण के निकट होने के बवाजूद पुण्य नहीं कमा सके लेकिन कर्ण दूर होकर भी गुप्त दान करके पुण्य के हकदार बने।
कहीं ऐसा तो नहीं कि दिखावा करके हम पुण्य की जगह पाप कमा रहे हों।

Share Button

क्या चुनाव जीतने की अनिवार्यता है धर्म ?

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी की आज की राजनीति पर गहरी चोट
‘‘अलीम’’
बीते दिनों कांग्रेस ने तीन राज्यों में सरकार बना ली। मेहनत का फल था या धर्म के उपयोग की पराकाष्ठा ये समझना पड़ेगा। कांग्रेस जीत के बाद सोशल मीडिया में दोनों पार्टियों की ओर से भड़ास की बयार बहने लगी जो अभी तक नही रुकी और 19 के चुनाव आते आते थमेगी कहा नहीं जा सकता।
सोशल मीडिया में जो तर्क दिए जा रहे उससे तो लगता है कि तीनों प्रदेशों की जनता ने कांग्रेस को जिता कर जैसे कोई पाप किया है। इसका प्रायश्चित 19 के चुनाव में इनके विपरीत वोट देकर करना चाहिए वर्ना पापी कहलाये जाएंगे।
असल में अपनी खोई हुई चीज को संघर्ष के बाद हांसिल करने की प्रसन्नता क्या होती है ये कांग्रेस के छोटे से कार्यकर्ता के चेहरे पर देखी जा सकती है। बीते कुछ वर्षों से कटुविरोध भद्दे मैसिज और कटाक्ष सुनने के बाद भी अपने हौसले को जिंदा रखकर राहुल टीम ने जिस तरह से कार्य किया और तीन प्रदेशों में सत्ता हासिल की उसकी प्रशंसा उनके धुरविरोधियों ने भी की भले ही दिल ही दिल में की हो।
वो पथ क्या, पथिक सफलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हों।
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या यदि धाराएं प्रतिकूल न हों।
उक्त पंक्तियों को चरितार्थ करके दिखाया।
हालांकि इस चुनाव में और गत वर्षों के चुनाव में उतना ही अंतर था जितना बॉलीबुड और हॉलीबुड की फिल्मों में होता है। बॉलीबुड की फिल्मों में हीरो को घिरा देख ऊपर से मदद मिल जाती है। जैसे मजार की चादर अपने आप लिपट जाना, होरो को मारी गई गोली 786 बिल्ले पर लगना, हताश होकर गिर जाने पर मंदिर के घण्टे खुद व खुद बज उठना, मंदिर का त्रिशूल हीरो के हाथों में आ जाना, चर्च का सलीब इत्यादि और कुछ फिल्मों में तो भगवान स्वयं आकर हीरो की मदद करते नजर आते हैं। ओ माई गॉड इसका प्रमाण है।
वही हॉलीबुड की फिल्मों में जमीन से लेकर आसमान तक जब भी हीरो मुसीबत में घिरता है उस समय जो करना होता है वो हीरो करता है। उसको किसी की न मदद आती है और न मांगता है।
ये चुनाव पूरे बॉलीबुड की तर्ज पर लड़े गए। हालांकि राजनीति यथार्थ है और फिल्में दिवा स्वप्न के सिवा कुछ नहीं फिर भी उस तर्ज पर राजनीति करना लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।
मैं किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हूँ।
लेकिन इतना जरूर पूछना चाहता हूँ कि खाद, किसान, पानी, भुखमरी, कुपोषण, शिक्षा, बेरोजगारी, महिला उत्पीड़न जैसे मुद्दे से किनारा क्यों किया गया।
जनेऊ, मंदिर, मस्जिद, दरगाह तो व्यक्तिगत धर्मिक आस्था है इनको राजनैतिक मुद्दे क्यों बनाया गया ? इससे विकास और रोजगार का दूर दूर तक मतलब नहीं है।
तीन प्रदेशों के चुनाव से साफ हो गया। ऐसा करके न केवल वोटरों के ठगा गया बल्कि लोकतंत्र को भी रुसवा किया गया। ऐसा नहीं है कि इन राष्ट्रीय राजनैतिक दलों की चालबाजी कोई देख नहीं रहा था। बहुत से देश भक्तों को इनके कारनामे पसन्द नहीं आये यही वजह थी कि लाखों की संख्या में नोटा का प्रयोग किया गया। यदि चुनाव के मुद्दे जमीनी होते तो लाखों लोग नोटा का प्रयोग न करके अपने मत का प्रयोग करते जिससे राजनैतिक दलों की स्थिति और अच्छी या बुरी होती।

Share Button

सब का उत्सव जालौन महोत्सव

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी की कलम
‘‘अलीम’’
जनपदवासी 12 दिनों तक महोत्सव में बुन्देलखण्ड की जमीन और संस्कृति से जुड़ी विभिन्न कलाओं का आनंद लेते रहे। इस आयोजन को सफल बनाने में प्रशासन ने पूरी ताकत झोंक दी। महोत्सव की सफलता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि 12 दिन चले महोत्सव में पंडाल के नीचे 12 दिन पैर रखने की जगह नहीं रही। कालपी के हाईवे की सफलता के बाद जालौन में 14 वर्ष बाद अधिकारियों ने इस आयोजन की भूमिका का खाका तैयार किया इसको तैयार करते समय जिन बातों का ध्यान रखा गया वो काबिले तारीफ है। जिला वासियों ने लोक कला से लेकर आधुनिक भारत के युवाओं में उपजे पश्चिम फैशन तक का आनन्द उठाया और स्पर्धा में भागीदारी भी की। कार्यक्रम जितने मनमोहक थे। उतने ही शांत प्रिय भाव से देखा और सुना गया । जिले के हर उस महिला, पुरुष और बच्चों को स्पर्धा में शामिल किया गया जो ये समझते थे कि हमारे अंदर टेलेंट है। जिलास्तर के एक जिम्मेदार अधिकारी ने तो यहां तक कहा कि इतने छोटी जगह में इतने बड़े टेलेंट कमाल से कम नहीं।
बच्चों के नृत्य, कवियों की कविता, गायकों की गायकी, शायरों की शायरी सब को नवाजा गया। डायलेसिस पर साँसे ले रही क्षेत्रीय संस्कृति को युवाओं के सामने रखकर उसे जिंदा करने का बेहतरीन प्रयास किया गया।
वैसे तो इस महोत्सव में सभी लोगों ने अपना कार्यक्रम समझकर भरपूर सहयोग किया लेकिन सारे कार्यक्रम के अलख जलाने वाले पत्रकार (मुकेश उदैनिया) ने इस आयोजन का शुरू से अंत तक कहा खाका तैयार किया और मीन टू मिनट का कार्यक्रम का संदेश शोशल मीडिया के सहारे जनता तक पहुंचाया । इस कर्यक्रम की धुरी रही महिला अध्यापिका (सारिका आंनद) ने जिस तरह से जिम्मेदारी निभाई उसकी सराहना करनी चाहिए। किसको कितना सम्मान मिलना चाहिए उन्होंने बखूबी जानतीं थीं और निभाया भी । ऐसा नही है कि उनके व्यवहार से कोई छुब्द न हुआ हो हुए लेकिन कार्यक्रम में उनकी लगन, मेहनत और समर्पण के आगे उनकी एक न चली जब कोई बेहद ईमानदारी से जिम्मेदारी को अंजाम देता है तो उसकी जिम्मेदारी की सराहना करनी चाहिए। ये छुब्द लोगो को सोचना चाहिए।
प्रत्येक दिन प्रोग्रामों के समापन के बाद जिम्मेदार अधिकारी उनके प्रोग्राम के प्रति समपर्ण की सराहना करते रहे। यही कारण रहा की हर दिन उनके अंदर नई ऊर्जा का संचालन होता रहा और बीते दिन से अच्छा आज का दिन बनाने में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करतीं रही। उनकी इस लगन और मेहनत देखकर ये बात साफ हो गई के आने वाले समय मे प्रशासन महिलाओ को अग्रिमपंक्ति में रखकर कर्यक्रम की जिम्मेदारी देने में हिचकिचाएगा नहीं।
धन्यवाद के पात्र हैं वो अधिकारी जिन्होंने क्षेत्रीय सांस्कृति जुड़े लोक कलाओं को प्रदर्शन करवाकर युवाओं, महिला, पुरुष, बच्चों और युवाओं के अंदर क्षेत्रीय लोककलाओं का दीप जलाया और धन्य है जनता जिन्होंने दर्शक बनकर क्षेत्रीय लोक कलाओं को अपने अंदर समेटा लिया। और जालौन महोत्सव को कामयाब बनाया हो सकता है इस कर्यक्रम की कामयाबी अगले साल फिर ऐसा आयोजन करने की रूपरेखा तैयार करे।

Share Button

कितनी दुर्गति सहती गईया………….

आज के समय की ज्वलन्त समस्या ‘अन्ना प्रथा’ पर गहरी चोट करती हुई कन्हैया की गइया की व्यथा। भूखे प्यासे घूम रहे गौवंश का यथार्थ चित्रण करतीं हुईं काव्य पंक्तियां।

कितनी दुर्गति सहती गईया………….

हे कृष्ण तुम्हारी धरती पर हम फिरते हैं भूखे-प्यासे।
बस एक प्रश्न इनसे पूंछो क्या भूल हुई है गऊ माँ से।।
हम कैसे अपनी भूख मिटायें कहाँ खायें भूसा सानी।
न जंगल हैं न पोखर हैं हम कहाँ जायें पीने पानी।।
जिस घर में सदा सम्मान मिला जब उनने ही लाठी तानी।
स्तब्ध रह गई गऊ माता गौवंश की छाती अकुलानी।।
तुमने तो हमारा दूध पिया फिर बेरहमी से छोड़ा ऐसे।
इतना भी तुमने न सोचा हम अपना पेट भरेंगे कैसे।।
हम खेत चरें नुकसान करें अपयश के भागी व्यर्थ बने।
है दोष तुम्हारा पशुपालक अन्ना क्यों छोड़ा है तुमने।।
आज द्रवित गौवंश कह रहा अगर कभी अब गऊ को पालो।
दुह कर दूध न अन्ना छोड़ो, अब यह अन्ना प्रथा न डालो।।
सुन कर गऊ की करुण कहानी भारत माँ ने कहा कन्हैया।
आज तुम्हारी ही धरती पर कितनी दुर्गति सहती गइया।।

– सिद्धार्थ त्रिपाठी

Share Button

क्या ये प्रतिभाए ऐसे ही गुमनामी में जीती रहेंगी

***अलीम***
*इन प्रतिभाओ को कब तराशा जाएगा।
*क्या जो पीछे होता रहा वो आगे भी जारी रहेगा?
*तो हम लोग नया कर क्या रहे है।
कल सड़क के किनारे एक खेल देख रहा था। 15 से 20 लोगो का मज़मा था। खेल नया भी नही था और कुछ खास भी नही था। खास इलिये नही था क्यों कि सड़क के किनारे बिना टिकट हो रहा था और नया इसलिए नही कि अक्सर गली कुचों में भी देखने को मिलता है। समझने की बात बस इतनी थी कि छोटी उम्र की बच्ची जिस कला का प्रदर्शन कर रही थी वो रोमांचकारी तो बहुत था लेकिन उनकी उम्र के लिहाज से बेहद खतरनाक भी था।5 या 6 साल की बच्ची जमीन से 8 फिट की ऊंचाई पर रस्सी पैर रखते हुए एक छोर से दूसरे छोर पर जा रही थी उस समय उनके बैलेंस को सभालने के लिए उसके मष्तिष्क में कितनी एकाग्रता होगी इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। डर और भय से बेखबर ये मासूम हर रोज ऐसा करके घर की जीविका चलती है।
इस उम्र में ऐसा काम करवाने के लिए कहि विवश नही किया जा रहा उसकी माँ से इसके बारे पूंछा तो बड़े लज़्ज़ा से बोली जब से मजबूरी ने घर मे पैर पसारे तब से इसी काम से पेट भर रहे है वर्ना कौन माँ चाहती है कि बच्चा ऐसा करे। माँ की बातों में ऐश-ओ-आराम से जीवन जीने की इक्षा मर सी गई थी बस हर रोज घर से दो तमन्ना लेकर निकलती है कि बच्चा सही सलामत नीचे उतर आए और इज़्ज़त,आबरू,बचाकर रोटी खाये।
कुछ भी हो वो बच्ची गजब की एकाग्रता का प्रदर्शन करती है। ये वही एकाग्रता है जिसके कारण सामान्य घरों के बच्चे को प्राईमरी पाठ शाला से लेकर उच्च स्तर तक की पढ़ाई के लिए गुरु,माता,पिता द्वारा कहा जाता है। ध्यान (एकाग्रता) लगा कर पढ़ाई करो। यदि किसी काम को बिना ध्यान के करो तो वो चलताऊ तो हो सकता है टिकाऊ नही।यदि इस तरह के बच्चे स्कूल की किताबो में अपना प्रतिभा दिखा दे तो उनकी कामयाबी को कोई रोक नही सकता । लेकिन रोटी कैसे खाएंगे ये भद्र समाज के लिए चुभता हुआ प्रश्न है।
फिर भी इन बच्चों को यदि यही प्रतिभा जिलास्तरीय या प्रदेश स्तरीय मंच पर दिखाई जाए प्रतिभा को समझने वाले औऱ तराशने वालो की कमी नही है । यदि इनका ये कलात्मक जीवन सड़क के किनारे प्रतिभा दिखाते दिखाते बूढा हो जाएगा तो उन बच्चों पर कोई फ़र्क नही पड़ेगा क्यों कि वो इसको अपनी जीवनशैली मान बैठे है। हम लोगो के बाद भी यही सिलसिला चलता रहेगा जो चलता आ रहा है। हम लोगो की तरह बाद की जनरेशन जेब मे हाँथ डालकर 10 रुपये या 20 रुपये देखे आगे बढ़ जाएंगे। इसलिए समाज और सरकार को सोचना पड़ेगा कि ऐसे बच्चों के बारे में योजना बनाये ।
क्यों कि जो बच्चे बिना तराशे (बिना ट्रेनिंग) अपनी प्रतिभा की चमक बिखेर रहे है। यदि इनको शिक्षित करके तराशा जाए तो आने वाले समय मे एशियार्ड और ओलम्पिक जैसे खेलों के कुम्भ से नई प्रतिभाये दुनिया मे देश का देश मे अपना नाम कमाएंगी ।वर्ना इनको तमाशे के रूप में हमलोगो के पुरखे देखते आये है हमलोग देख रहे हमारी पीढ़ी देखेगी।
हम लोग क्या नया करके जाएंगे विचारणीय है।

Share Button

ये कब तक चलेगा……..

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी की कलम

**अलीम***
हम शिक्षित हो गए सभ्य हो गए जल्दी ही दुनिया में महाशक्ति वाले देशों के साथ खड़े होने वाले हैं। लेकिन हमारे समाज की सोच का दायरा वही है जहां था।समाजिक संरचना में दहेज का आज भी उच्च स्थान है भले ही कोई सम्प्रदाय हो।
बीते दिनों जालौन जनपद में एक घटना घटी जिसमे बेटी के अरमानों पर तेजाब फैंका गया। एक परिवार बारात दुल्हन लेने आया। बारात दरवाजे पर आई बधू पक्ष के लोग द्वारचार्य के लिए आ गए । उसी समय वर पक्ष के लोग बधू के पिता से कुछ कह रहे थे। बैण्ड और डीजे की धमक से बात वही दबी रह गयी लेकिन वर माला के समय यह बीमार मानसिकता उभर कर सामने आ गयी जिससे तस्वीर बिल्कुल साफ हो गई।
बात दहेज में पैसा बढ़ाने को लेकर हो रही थी जिसमे लड़की के पिता अपनी असहायमति जता रहे थे। लेकिन वर पक्ष कुछ सुनने और मानने को तैयार नही था।बातों की तकरार जब मार पीट में बदल गयी तो बात सार्वजनिक हो गई। लड़की को अपने पिता का अपमान बर्दाश्त नही हुआ उसने एलान कर दिया के ऐसे घर मे बहु बनकर नही जाना जहां बहुओं का सौदा होता हो।
लड़की ये फैसला जब सुना रही थी उस होंठ,हाँथ,और गुस्से से तमतमाता चेहरा देखकर लोग दंग रह गए। शादी की
औपचारिकताये (मैकप, मेहंदी, चूड़ी,शादी का सूट) से सज चुकी लड़की के मुह से ऐसा सुनना किसी आश्चर्य से कम नही था। पिता का मान और परिवार की शान बनी रहे ये हर लड़की सोचती है। लेकिन हम उसके बारे में क्या सोच रखते ये मानसिकता जाहिर हो गई।
जब तक हमारा समाज समाजिक मान मर्यादा को ताक में रखकर दहेज रूपी दानव के आगे धूपबत्ती जलता रहेगा । घर ऐसे ही बर्बाद होते रहेंगे। बात सिर्फ उक्त लड़की की नही है समाज मे फैला ये जहर आखिर कब खत्म होगा पश्चिम के दर्शन से हम लोग बहुत प्रभावित है। मोडेनाईज़ भी हो चुके है लेकिन घटिया और बेहूदा सोच को अपने सीने से लगाये है। बात यही खत्म नही होती हाल में वाह वाही लूट चुकी लड़की के ऊपर आगे समाज बेफज़ूल के आरोप प्रत्यारोप मढेगा दूसरी जगह शादी करना कितना मुश्किल काम होगा ये उसके मा बाप भी जानते है और समाज भी।
बदलना हम लोगो को पड़ेगा नही तो बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ महिला आरक्षण जैसे नारो से कुछ नही होने वाला।

Share Button

ये किस मानसिकता का द्योतक है…

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी की गहरी सोच
‘‘अलीम’’
हाल ही में दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में दो सम्प्रदाय के मासूमों को क्लासों में बांट दिया गया। सुनने में ये बात छोटी लगती है लेकिन इस मानसिकता के दूरगामी परिणाम ठीक नहीं हैं। मास्टर साहब ने ऐसा क्यों किया इसमे उनका तर्क था ऐसा मैने जानबूझ कर किया जिससे पढ़ाई में अड़चन न हो बाकी सारी सुविधायें दोनों कक्षाओं में सामान्य सुविधा दी गई है। हैरान कर देने वाला ये तर्क शासन के गले नहीं उतरा और प्रधानाध्यपक को निलंबित कर दिया गया। निलंबन इसका हल नहीं क्यों कि थोड़े दिन बाद कोर्ट जाएंगे और अपने किये की माफी मांगेंगे उन्हें माफ कर दिया जाएगा और प्रधानाध्यपक जी पुनः अपने काम पर लौट आएंगे । लेकिन जो बीज वो मासूमों में बो गए वो एक दिन जरूर दूरी नामक पेड़ बनेगा और उसमे नफरत का फल लगेगा। इस मानसिकता की जड़ में जाना पड़ेगा। आखिर इस प्रतिशोध का कारण क्या है। वो बच्चे तो अभी मन्दिर, मस्जिद, हिन्दू, मुस्लिम, जात-पात से दूर हैं उनको इन बातों का इल्म तक नहीं फिर क्यों उनको याद दिलाया गया कि तुम हिन्दू और वो मुसलमान हैं ये सोच साधारण नहीं हो सकती इसके पीछे का कारण तलाशना जरुरी है। ऐसा नहीं है के पूरा स्कूल प्रबंधन इसके लिए दोषी है क्यों कि ये सर्व सहमति से नहीं हुआ उसी स्कूल के कई अध्यपक इस कृत्य के खिलाफ थे। लेकिन प्रधानाचार्य की हठधर्मी के आगे उनकी एक नहीं चली। तो क्या प्रधानचर्या जी ऐसा करके सरकार को खुश करना चाहते थे? लेकिन
बीजेपी की सरकार तो पहले भी बन चुकी है इससे पहले तो कभी ऐसा देखने और सुनने को नहीं मिला। या किसी हिन्दू संगठन को खुश करना चाहते थे? हिन्दू संगठन भी धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं स्कूली बच्चों में उनका ध्यान कभी केन्द्रित नहीं रहा उनका इतिहास बताता है?
ये धार्मिक सोच भी नही हो सकती क्यों कि धर्म की शिक्षा लेने वाला विद्यार्थी सँस्कृत स्कूल में जाता है या मदरसे में । तो क्या ये प्रधानाचार्य का शोध था । सोच सिर्फ खुद की उपज है जो लाइम लाइट में आने के लिए की जाती है। प्रधानाचार्य अपनी चाल में कामयाब हुए क्यों कि शाम होते ही वह टी वी चैनलों के लिए विषय बन गये और उनकी अनसुलझी सोच पर बहस हुई जो बेनतीजा समाप्त हो गई।शाम होते ही चौनलों में बेरोजगारी, महगाई, शिक्षा, अपराध जैसे मूलविषयों को छोड़कर धर्म, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, कुपोषण, चुनाव जैसे मुद्दों पर सब्जी मंडी रूपी बहस शुरू हो जाती है। जिसकी देश की तरक्की से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं। जब इस तरह की बहस समाज में सर चढ़ कर बोलती है तब देश की राजधानी के स्कूलों में बटवारे जैसे प्रवृत्ति जन्म लेती है। इस प्रवृत्ति का इलाज समय रहते नहीं हुआ तो ऐसा न हो कि भविष्य में ये मानसिकता नासूर के रूप में सामने आ जाये।

Share Button

कृष्णा न्यूज़ की सफलता

कृष्णा न्यूज़ की सटीक खबरों से तथा आपके अपार स्नेह के बाद कृष्णा न्यूज़ एक और कदम कृष्णा मेल अब अखबार के रूप में भी अब आपके हाथो में

Share Button

क्या गूढ़ रहस्य छिपाए मायावती का बयान

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी 
**अलीम***
मायावती की राजनीतिक चालों को समझना आसान बात नहीं है। जितना उनके सहयोगी समझ रहे हैं शायद उससे ज्यादा रहस्य उनकी बातों में छिपे होते हैं। इसलिए हाल ही में दिए गए उनके बयान ने कहीं खुशी कहीं गम जैसे हालत पैदा कर दिए। गठबंधन के साथियों को सकते में डाल दिया तो गठबंधन के विरोधियों के चेहरे पर मुस्कुराहट।
असल में मायावती राजनैतिक स्तर से कब करवट ले लें कहा नहीं जा सकता। क्योंकि वे उस मिशन की उपज है जिसने डर, भय, यातनाओं को जीत कर पार्टी का निर्माण किया है। अगर मिशन के शुरुआती और संघर्ष के दौर में सामने वालों की हां में हां मिलाने की आदत होती तो न मिशन कम्प्लीट होता न पार्टी बनती। इसलिए बात को कहना और अपनी बात मनवाना उनको विरासत में मिला है।
ऐसे में मायावती के बयान को सुनकर सत्ताधारियों के चेहरे पर लाली और होठों पर कुटिल मुस्कान आ गयी है। वे सोच रहे हैं कि अब गठबंधन बनने से रहा क्योंकि उत्तर प्रदेश में गठबंधन का बड़ा पहिया पटरी से उतर गया। वैसे राजनीतिक विश्लेषक इसमें खुश होने की ज़रूरत नहीं बता रहे। क्योंकि इससे पहले भी बहनजी उनके साथ सरकार और रिश्ते दोनों चला चुकी हैं। रिश्ते की गवाह लालजी टण्डन की कलाई है। सत्ता के साक्षी कल्याण सिंह। इसी रिश्ते की लाज रखने को 2002 में मायावती ने गुजरात में मोदी के लिए तबातोड़ दौरे किये। जिससे उनकी पार्टी का एक बड़े वोट बैंक को झटका भी लगा था। लेकिन उसके तुरन्त बाद में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में हद से ज़्यादा सीटों पर उनकी भागीदारी करके उस वोट बैंक को मना लिया।
असल मे मायावती और बीजेपी गठबन्धन के कई कारण थे। सत्ता की लोलुपता तो थी ही साथ में वी.आई.पी गेस्ट हाउस में अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की ज्वाला दिल और दिमाग पर छाई थी। इस कांड में प्रदेश स्तरीय पार्टियों के साथ कुछ माफियाओं का हााथ था तो कुछ साथ में भी थे। यही कारण है कि अतीक अहमद आज तक राजनीति में सफल नहीं हो सके। इनसे मुकाबला करने को सत्ता पर कब्जा करने से अच्छा कुछ नहीं हो सकता था। ये ज्वाला ठंडी न हो जाये ये चिन्ता बसपा से ज़्यादा उन राजनैतिक पार्टियों को थी। जिनको इस बात का इल्म था कि ये गठबंधन दोबारा हो गया तो हम कभी सत्ता में नहीं आ पाएंगे।
इसलिए इस कांड को दलित का अपमान बताकर घाव को ताज़ा रखने का काम किया गया। लेकिन समय और परिस्थिति गहरे से गहरे घाव भर देता है। जब 2014 में लोकसभा में बसपा शून्य पर आई और 2017 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में 19 सीटों पर रुक गयी। दिल्ली का सपना देखने वाली पार्टी को विधायक/सांसद बनाना भी मुश्किल हो गया। पार्टी की इस स्थिति को देख सत्ता के गलियारे में मज़ा लेने वाले नेताओं पर गाज गिरना सुनिश्चित थी। पार्टी के महत्वपूर्ण नेता भी इस बात को समझ रहे थे। जब उनको निकाला गया तो उनको खेद नहीं हुआ क्योंकि पैसे की इतनी खेती कर चुके थे कि उनकी सात पुश्तें बैठ कर खाएंगीं। बुन्देलखण्ड के मुस्लिम नेता ने एलान कर दिया। फिर भले ही वह फिर कांग्रेस की गोद मे बैठ गए ।
इतना सब कुछ देखने और समझने के बाद पार्टी का थिंक टैंक एकजुट हुआ। जिसमें फैसला लिया गया कि पुराने गिले-शिकवे भुलाकर गठबंधन करना पड़ेगा, ये आज की मांग है और वजूद बचाने की राह भी। जब इस बैठक की भनक सत्ताधीशों को पड़ी तो शायद भारत की सबसे विश्वसनीय और अद्वितीय जांच एजेंसी से शिकायत का ख़ौफ़ दिखाया गया।
जिसके चलते उन्होंने न कोई भतीजा, न कोई बुआ होने की बात कही। वहीं कांग्रेस को परम्परागत तरीके से कोस कर गठबंधन के रथ में नकेल डाल दी। उनके इस बयान से गठबन्धन खिल्ली उड़ने लगी लेकिन खिल्ली उड़ाने वाले कर्नाटक के स्टेज भूल गए। क्योंकि मायावती एक ऐसी नेता है जो बिना मतलब के कहीं नहीं जाती जो नेता विधानसभा मे चुनावी सभा का खर्च अपने प्रत्यशियों के सिर मढ़ देती है उन्हें उस नेता को कर्नाटक के स्टेज पर चढ़ने के मतलब खिल्ली उड़ाने वालों को समझना चाहिए। गठबंधन में कितनी गहराई है इसको समझने के लिए अखिलेश यादव के बयान से साबित हो रहा है। जब अखिलेश यादव से मीडिया ने मायावती के रुख की चर्चा की तो उन्होंने कहा कि आप लोग न परेशान हों इसकी जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ दो। गठबंधन में कितनी मजबूती है, फिलहाल इसे अखिलेश के इस बयान से समझा जा सकता है।

Share Button

सामंजस्य का मजबूत पुल….

वरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी का दिल को छू लेने वाला आलेख
‘‘अलीम’’
जब तक धागा सुई के छिद्र से पार न हो जाय………
जिस तरह जालौन के कालपी में प्रशासन ने राष्ट्रीय राजमार्ग का रास्ता साफ किया है वो पहले भी इतना ही आसान था जितना आज है।
असल मे पिछली सरकारों ने काम तो किया लेकिन दृढ़ निश्चय की कमी रही यही वजह रही के 2004 में बनकर तैयार हाईवे में सामांजस्य की कमी के चलते 100 से अधिक लोगों को जाम में जान गवानी पड़ी। योगी सरकार के अधिकारियों ने जिस लगन और मेहनत से धार्मिक भावनाओं वाली बस्ती में इस काम को दोनों समुदाय से सामंजस्य बैठाकर अंजाम दिया वो कल इतिहास में दर्ज तो होगा ही साथ देश मे विकास की धारा में मजहबी अड़चनें कैसे खत्म की जाती हैं ये नजीर भी बनेगा ।
क्यों कि विकास जब सामने दिखता है तो धार्मिक भावनाएं भी दुबक जातीं हैं। और विकास को गति मिल कैसे मिलती ये साक्षात नमूना कालपी में देखने को मिला।
असल मे कालपी एक ऐतिहासिक नगरी है । जहां एक ओर कालपी वेद्व्यास की जन्म स्थली है वही मुस्लिम समुदाय के आस्था के प्रतीक तमाम बुजुर्गों की मजारे कालपी में स्थित है। कब्रेज के दौरान जो बातें सुनने में आई वो चौकाने वाली थी। एक समुदाय विशेष के धर्म गुरु ने बताया कि हम कब तैयार नही थे लेकिन कभी हमसे बात ही नही की गई।जाम में फँसकर जो मौते हुई है उसके जिम्मेदार पिछली सरकारी की निष्क्रियता है।
उन्होंने बताया कि जब भी जाम में फंसा कोई बीमार मौत के गाल में समाता था उस समय हमें अफसोस नही होता था बल्कि अफसोस के साथ अपने आप को उस मौत का जिम्मेदार महसूस करते थे। यही कारण था के मस्जिद को मिस्मार होते हुए देखते रहे।
वही दूसरी बहुसंख्यक समुदाय के सामने दुर्गा जी और शिव जी का मंदिर हटाया गया ये जब हो रहा था उस समय भक्तों की भक्ति पर कितना बड़ा झटका लगा होगा इसकी कल्पना की जा सकती है लेकिन और दोनो समुदाय के बीच जो सामंजस्य का पुल सरकार के नुमाईंदों द्वारा बनाया गया था उसमें गजब की मजबूती देखने को मिली। वर्ना आस्था और यकीदे का बोझ सम्भाले नहीं सम्भलता ये अयोध्या से साबित है।
कालपी के जिम्मेदार लोगों को प्रशासन से बस एक शिकायत है उनका कहना है कि जब हम लोगों ने अपने हाथ को अपके हाथ रख दिया था। तो सुरक्षा के नाम पर 1000 सुरक्षा कर्मीयों को लगाकर इतने पैसे की बर्बादी क्यों कि गई।
वहीं प्रशासन के बेहद जिम्मेदार अधिकारी ने बताया कि ये तो हमारी मजबूरी थी उनका कहना है कि जब सुई में क्षमता से मोटा धागा पिरोया जाता है तो सारा ध्यान वहीं रखा जाता है जब तक धागा सुई के छिद्र से पार न हो जाये।

Share Button

सड़क पर न्याय कब तक ?………

बरिष्ठ पत्रकार अलीम सिद्दीकी
बिहार के भोजपुर जिले बिहिया कस्बे में बीते दिनों जो हुआ उसको मॉब लांचिंग के नाम देकर टाला नही जा सकता
उपद्रवियों की हैवानियत तो साफ दिखाई दे रही थी लेकिन भीड़ में पीठ पर बस्ता टांगे स्कूल के बच्चे, जिनको शायद बोध भी नही होगा के ये किस तरह के गैर कानूनी, गैर सामाजिक और अन्याय पूर्ण, काम का हिस्सा बन रहे हैं। जिनको समझाने मात्र से हादसा टाला जा सकता था।
यदि कस्बे के समझदार और जिम्मेदार और सामाजिक लोगों ने अपने कर्तव्यों का निर्बाह किया होता तो औरत की लाज और 17 लोग जो जेल भेजे गए हैं उनमे से इंटरमीडियट के 5 छात्रों का भविष्य खराब होने से बच जाता। लेकिन किसी ने प्रयास तक नहीं किया के उनसे कहे कि तुम लोग गलत कार्य कर रहे हो। महिला के साथ जो हुआ वो हम लोगो की असंवेदनशीलता की दास्तां चीख चीख के बयान कर रही थी । 16 वर्षीय युवक का शव रेल की पटरी देखकर परिवार वालों का क्रोध आना स्वभाविक था। लेकिन सब को गुस्सा आ गया और एक आवाज में तांडव ग्रुप एक मत हो गया और शक के आधार पर एक महिला के घर में आग लगा दी सब कुछ फूंकने के बाद महिला को जूतों से मारा और निर्वस्त्र करके बाजार में घुमा घुमा कर पीटा गया। उस समय महिला को पीटते देख उसे हिकारत की निगाह से देखने वाली हजारों आंखों में किसी को लाज नही आई। आगर आई होती तो एक चादर का टुकड़ा लेकर उसके नंगे तन पर डाल कर उसके प्रति सम्वेदनाएँ तो व्यक्त की जा सकती थी।
बजाए उसको उपद्रवियों की हाँ में हाँ मिलाते नजर आये। किसी ने ये नही सोचा के उसको बचा लें । जिनके दिल में उसको बचाने की जिज्ञासा थी वो पुलिस का इंतजार करते रहे। थाना घटना स्थल से मात्र आधा किलो मीटर दूर था लेकिन आधे दिन बीत जाने के बाद पुलिस को खबर मिली। घटना स्थल पर पहुंचते ही भोजपुर एस.पी. अवकाश कुमार ने अपने विभाग की चूक माना 8 सिपाही और एक एस.एस.एच.ओ. को सस्पेंड कर पीड़िता को फौरी तौर पर राहत दिलाई।
लेकिन पुलिस को सूचना देने में देर करना, रमणी को निर्वस्त्र घूमते देखना और निर्वस्त्र करके बाजार में घूमाना इन सबके जिम्मेदार हम लोग हैं। हम लोगों को भी सभ्यसमाज निर्माण में अपनीं नैतिक जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। दिल से पश्चाताप करना चाहिए।
इस मामले की नकामयाबी की बॉल पुलिस की तरफ फेंकना इंसाफ की बात नहीं होगी।
कब तक हम सड़क पर अदालतें चलते देखते रहेंगे बिना दलील के सड़कों पर कथित न्याय देना कहां तक उचित है ये भी समझने की जरूरत है।
कमाल तो इस बात का है देश में इतना बड़ा मामला हो गया तो टीवी पर बैठ कर हम तो पूंछेंगे वालों ने बहस तो छोड़ो बात करना भी गवारा नहीं की। असल मे जिस अबला का भरे बाजार और सारे राह चीरहरण हुआ उसका कोई प्रोफाइल नहीं था। तो किसी को फिक्र भी नहीं थी।
घटना के बाद सरकार पर आरोप, और पुलिस पर लांछन लगाना तब उचित है जब हमलोगों ने ऐसा न होने देने का प्रयास किया होता।
जब यह सब हो रहा था और हमारीं आंखे देख रहीं थीं और हम कुछ नहीं कर पा रहे थे। पुलिस आने का इंतजार कर रहे थे और पुलिस कार्यवाही के बाद नामदर्ज लोगों की सिफारिश में अपना समय बर्बाद करने लगे।
तो बेहद जिम्मेदारी से और निसंकोच हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम लोगों की जिम्मेदारी में कमी रह गयी।
बहादुरी भीड़ का हिस्सा बनने से नही आंकी जाती भीड़ के विपरीत चलना ही बहादुरी है।
अगर देश को आजाद करने के लिए देश के शहीद अंग्रेजों की भीड़ में शामिल हो गए होते तो न देश आजाद होता न शाहीदों की बहादुरी की दांस्ता होती।
आने वाली नस्लों के लिए क्रोध, घृणा, छोड़ कर न जायें प्यार मोहोब्बत और समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी तय करके जाएं जिससे आगे की नस्लें जिम्मेदारी समझें और सभ्य समाज का निर्माण हो सके।

Share Button